मुरलीधर राव

भारत के लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 63वीं जयंती इस बार इस नजरिए से यादगार रही कि शायद पहली बार इस दिन को औपचारिक तरीके मात्र से ही नहीं मनाया गया बल्कि उनके विचारों और देश प्रेम को देश के घर-घर तक पहुंचाया गया। इस प्रयास की शुरूआत तब हुई जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोचा कि सरदार पटेल के योगदान को महज भाषणांे में न समेटते हुए कुछ ऐसा किया जाए जो उनके विचारांे को अच्छे से दर्शाएं, इसलिए “रन फार यूनिटी“ के आयोजन की अवधारणा ने जन्म लिया। ‘रन फार यूनिटी’ सरदार के सपनों के भारत का प्रतीक बनी। यह तय किया गया कि लाखों लोग जो अलग-अलग धर्म जाति आदि के है वो एक साथ आगे आएं और अपने आप को एक संयुक्त और खुशहाल-श्रेष्ठ भारत बनाने के लिए समर्पित करें।

 

इसी श्रृंखला में एक और आयाम है ‘‘स्टेच्यू आॅफ यूनिटी’’ जो सरदार पटेल की एक बडी लौह प्रतिमा होगी। इसके लिए लोहा पूरे भारतवर्ष के किसानों से उनके औजारों के रूप मे इकट्ठा किया जाएगा। इस परियोजना के प्रति हमारे किसानांे का उत्साह देखकर यह लगता है कि यह मूर्ति पूरे विश्व में सबसे बडी मूर्ति होगी। इस तरह यह अपने आप में ही सरदार पटेल और उनके देश प्रेम को एक विलक्षण श्रद्धांजलि होगी।

 

सरदार पटेल एक सच्चे देशभक्त थे। जिनका सपना एक चमकते और खुशहाल भारत का था जिसका विश्व में डंका बजे। अगर ये सपना साकार नही होता है तो इसके लिए सिर्फ कांग्रेस सरकार ही जिम्मेदार होगी। वर्तमान में अल्पसंख्यकों को लेकर कांग्रेस की सोच विकृत है जबकि अल्पसंख्यकों को लेकर सरदार पटेल का स्पष्ट मत था:-

 

‘‘….अब देश का विभाजन पूरा हो चुका है और आप कहते है कि हमें इसे पुनः लाना चाहिए और दूसरा विभाजन करना चाहिए। इस प्यार के तरीके को मैं समझ नहीं पाता हूँ। यदि वह तरीका जो अपनाया गया और जिसके परिणामस्वरुप देश का विभाजन हुआ, अगर इसे दुहराना है तो मैं कहता हूं कि जो उस तरह की चीजे चाहते हैं उनके लिए पाकिस्तान में जगह है, यहां नहीं। यहां हम एक राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं, हम एक राष्ट्र की नींव रख रहे हैं और जो पुनः विभाजन चुनने वाले हैं तथा बिखराव के बीज बोना चाहते हैं उनके लिए कोई जगह नहीं होगी, न ही कोई कोना है। मैं बिलकुल पूरी तरह से स्पष्ट कर देना चाहता हूं। जब मैं बीते दिन की बात भूल जाने को कहता हूं तो मैं यह बात मन से कहता हूं। आपके प्रति कोई अन्याय नहीं होगा। आपके प्रति उदारता रहेगी किन्तु प्रत्युत्तर निश्चित रूप से होनी चाहिए। अगर यह नहीं रहा तो आप मेरी ओर से यह ले लीजिए कि कोमलतम शब्द भी आपको शब्दांे के पीछे क्या उसे छिपा नहीं पायेगा। इसलिए मैं एक बार फिर बडी सादगी से और मजबूती से आपसे निवेदन करता हूं कि हम भूल जाए और एक राष्ट्र बन जाएं।’’

 

इसके विपरीत हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के विचार विभाजन करने वाले है जो कहते है कि ‘हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों को, सबल बनाने के लिए अभिनव योजनाओं को विकसित करना होगा ताकि विकास का लाभ समान रूप से उनको वितरित हो सके। उनका कहना है कि संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का दावा सबसे पहला होना चाहिए’।

 

सरदार पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाता है लेकिन उनकी सफलताएं उनसे भी बडी है क्योंकि उन्होनें ऐसे माहौल में काम किया जो कि बहुत कठिन थे। उन्हांेने छोटी-छोटी रियासतो और जागीरों को, जहां अलग अलग भाषाएं, परंपराएं और धर्म थे, को एक देश के रूप में एकीकृत किया, जहां आज विश्व की 17.5 प्रतिशत आबादी रहती है। इस विश्व में सबसे बडी जनसंख्या के रूप मे भारत का प्रभाव सरदार पटेल के योगदान के कारण है। उन्होनें इस असंभव दिखने वाले कार्य को उस समय अंजाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे । अगर सरदार पटेल निरंतर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक दूसरे से लडते रहते। उन्हांेने जगह-जगह घूमकर सब राजाआंे को एकसाथ जोडकर भारत बनाने के लिए राजी किया, उन्हें सबको इकटठा करने में थोडा समय लगा और उन्हंे इसके इसके लिए हिंसा बल का प्रयोग नही करना पड़ा।

 

जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ ने प्रतिरोध किया पर पटेल के मजबूत इरादों ने स्पष्ट कर दिया कि भारत एक एकीकृत इकाई बनकर रहेगा। उन्हांेने इन राज्यांे में अपनी सेना भेजी। नेहरू और माउंट बेटन हिचकिचा रहे थे, उन्हे डर था यदि हैदराबाद मे जबरदस्ती की गई तो हिन्दू मुस्लिम दंगे ना हो जाए, पर पटेल को लगा कि अगर नरमी से पेश आए तो दिक्कते बढ़ेंगी। उन्हांेने मुस्लिम रजाकारों को, जो चाहते थे कि हैदराबाद के निजाम भारत से दूर रहंे, के खिलाफ ‘आपरेशन पोलो’ शुरू किया। कश्मीर पर भी पटेल के विचार नेहरू से भिन्न थे।

 

के.एम. मुंशी लिखते है “जवाहर लाल नेहरू ने यदि शेख अब्दुल्लाह के बहकावे में आते हुए जम्मू कश्मीर का जिम्मा पटेल से न लिया होता तो समस्या इतनी न होती जितनी आज है।’’ सरदार ने भी कई बार कहा है कि अगर नेहरू ने उन्हें कश्मीर को सम्हालने दिया होता जिस तरह हैदराबाद को सम्हाला था तो यह समस्या इतनी न बढ़ती। उन्हांेने शेख अब्दुल्ला द्वारा किए गए वादें पर शंका व्यक्त की थी, जिसे नेहरू ने अनदेखा कर दिया था। नेहरू ने इस गलती को बाद में कबूल भी किया लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान के बाद।

 

पटेल ने भारत व चीन के मध्य तिब्बत की महŸाा को महसूस किया। इसलिए इन्हांेने भीमराव आम्बेडकर और वीर सावरकर के विचारांे को साझा किया और तिब्बत मुक्ति आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने नेहरू को भी लिखा था “हमें अपनी स्थिति सिक्किम के साथ ही तिब्बत में भी मजबूत करनी है। आगे हम साम्यवादी ताकतों को दूर रखें -वही बेहतर है। तिब्बत को चीन से काफी अलग कर दिया गया है। मुझे आशा है कि जैसे साम्यवादियों ने चीन के बाकी हिस्सों में खुद को स्थापित किया है, वैसे ही वे इसके स्वायत्त अस्तित्व को नष्ट करने की कोशिश करेंगे। आप अभी से ऐसी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तिब्बत के प्रति अपनी नीति पर विचार करें और उस स्थिति के लिए तैयारी करें।“

 

उन्हांेने दूसरे नेताओं को, जो कांग्रेस की नीतियांे के खिलाफ थे, पर एकीकृत भारत की चाह रखते थे, के योगदान को कभी अनदेखा नही किया। पटेल की राष्ट्रीयता की भावना के बारे में उनके निजी सचिव वी.शंकर बताते है ‘‘हालांकि सरदार पार्टी के एक सशक्त नेता थे, फिर भी वह देश के व्यापक हित में न केवल झुक जाते थे, बल्कि राष्ट्रीय जीवन से जुड़े अन्य लोगों का सहयोग भी प्राप्त कर लेते थे। इसका एक शानदार उदाहरण यह था कि किस तरीके से उन्होंने स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू को अपनी सरकार बनाने की सलाह दी थी, जो न केवल वास्तव में राष्ट्रीय स्वरूप की थी, अपितु जिसके समर्थन में उनको डा. बी.आर. आम्बेडकर और श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे कांग्रेस के आजीवन विरोधियों की सेवाओं को प्राप्त करने में किसी प्रकार की झिझक नहीं थी। ”सरदार पटेल से जुड़े दस्तावों के संग्रह के संपादक डा. पी.एम. चोपड़ा के अनुसार, ‘‘पटेल ने न केवल अम्बेडकर को विधिमंत्री नियुक्त करवाया, साथ यह सुनिश्चित किया कि वह अपना कार्यकाल पूरा करें, बावजूद इसके कि नेहरू उन्हें एक समय उन्हें निकालना चाहते थे।“

 

उनका योगदान केवल राजनैतिक नही था अपितु उन्हांेने भारतीय समाज के मूल्यांे को मजबूत बनाने में भी अपना योगदान दिया उन्हीं की प्रेरणा और मार्गदर्शन मंे किसानों ने मिलकर “दुग्ध क्रांति” की शुरूआत की और अमूल जैसा ब्रंाड उभर कर आया। सोमनाथ मंदिर को बचाने के पीछे भी वही थे। उन्हे भारतीय प्रशासनिक सेवाओं का संत भी कहा जाता हैैं।

 

‘स्टेच्यु आॅफ यूनिटी’ के जरिये हम सरदार पटेल के योगदान को और मजबूती से रेखंकित करना चाहते हैं। भारत की राजधानी में उनके लिए कोई भी स्मारक नही है, जबकि यहां कितने ही बाग और स्मारक पटेल से कम प्रतिभावान लोगों को समर्पित किये गए हंै। इस कार्य को इसी उद्देश्य से नियोजित किया गया है ताकि भारत में एकता की लहर आ सके। युवा पीढ़ी के जोश और उत्साह से और लाखांे किसानांे के लौह दान से यह साबित हो रहा है।

 

सरदर पटेल किसी एक समुदाय या राजनैतिक पार्टी की सम्पत्ति नही है। ऐसा करना देश के लिये उनके सम्पूर्ण योगदान को खारिज करने के बराबर होगा।

 

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)