शांति से बढ़ता श्रीलंका

27_10_2014-murlidharr26 तमिलनाडु के राजनीतिक दल एमडीएमके के नेता वाइको ने श्रीलंका के मामले में मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना कर एक बार फिर यह साबित कर दिया कि इस राज्य की राजनीति में श्रीलंका और विशेष रूप से वहां के तमिलों का प्रभाव अभी बना रहेगा। वाइको ने श्रीलंका के संदर्भ में मोदी सरकार द्वारा उठाए गए तमाम कदमों का विरोध किया है, जिनमें श्रीलंका के शीर्ष रक्षा अधिकारियों का भारत आना भी है। तमिल हितों के नाम पर किसी राजनीतिक दल के इस तरह के रवैये को खासकर तब स्वीकार नहीं किया जा सकता जब हर कोई यह महसूस कर रहा है कि श्रीलंका युद्ध के लंबे दौर से उबरने के बाद शांति और स्थिरता के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है। सामान्य स्थितियां एवं शांति किसी भी राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियों और विकास के लिए अतिमहत्वपूर्ण अवयव हैं। पिछले पांच वर्ष से स्थापित शांतिपूर्ण वातावरण ने श्रीलंका सरकार को सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के साथ-साथ विदेशी निवेश को आकर्षित करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भागीदारी करने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की है। वहां के सभी राजनीतिक दल और उनके नेता आज अपने अलग-अलग दृष्टिकोण के बावजूद बिना किसी खतरे के सामान्य गतिविधियों का संचालन करने में सक्षम है। इसीलिए वहां लोकतंत्र कामयाब हो रहा है।

संघर्ष विराम के साथ श्रीलंका त्वरित आर्थिक विकास की ओर उन्मुख है। सकल घरेलू उत्पाद की दर वर्ष 2009 में 3.5 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2011 में 8.3 प्रतिशत हो गई। तब से विकास दर भी मजबूती के साथ सात प्रतिशत से अधिक बनी हुई है। इसी के साथ गत वर्षो में श्रीलंका में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निरंतर वृद्धि हुई है। पिछले 3 वर्षो से श्रीलंका की औद्योगिक विकास की दर लगभग 10 प्रतिशत है। इस बढ़ते निवेश के कारण आर्थिक स्तर पर व्यापक सुधार हुआ है। परंतु किसी को यह धारणा नहीं बनानी चाहिए कि हिंसा के द्वारा समस्याओं का समाधान स्वत: मिल जाता है। वहां विरोधी दृष्टिकोण और राजनीतिक आकांक्षाएं सरकार और ईलम के लिए लड़ रहे अलगाववादी संगठनों के बीच भयानक युद्ध के लिए जिम्मेदार थीं। श्रीलंका में सिंहली एवं तमिल जातियां इस हिंसा के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई थीं। वर्ष 2000 से 2009 के बीच श्रीलंका में हिंसा के कारण मरने वाले नागरिकों की संख्या लगभग 13,500 थी। इसके अलावा इस अवधि में लगभग 5000 से अधिक सैनिकों एवं 22,500 उग्रवादियों को अपनी जान गंवानी पड़ी, लेकिन श्रीलंकाई समाज शांति के मूल्य को भलीभांति समझता है।

युद्ध के पश्चात श्रीलंका एक सराहनीय चुनावी प्रक्रिया से गुजरा है। उत्तरी प्रांत के मुख्यमंत्री सहित तमिल नेशनल एलायंस के नेताओं को उनके प्रतिद्वंद्वियों द्वारा भी मजबूत और सक्षम नेताओं के रूप में देखा जाता है। तमिल नेताओं ने जनता से किए वादों को यूनाइटेड श्रीलंका की रूपरेखा के भीतर पूरा करने की मांग की है। इसके लिए एक संसदीय चयन समिति का गठन किया गया है, परंतु मुद्दों के अंतरिम समाधान के लिए सरकार की गंभीरता एवं प्रतिबद्धता को लेकर सरकार एवं तमिल नेशनल अलायंस के बीच विश्वास का अभाव है। इसीलिए वहां कुछ समय से गतिरोध की स्थिति है। राजपक्षे को शांति बहाली एवं क्षेत्र के समुचित विकास के लिए लंबे समय से लंबित तमिल समस्याओं का संगठित श्रीलंका के ढांचे के अंतर्गत स्थायी समाधान आवश्यक है। भारत श्रीलंका का एक विशिष्ट पड़ोसी एवं सांस्कृतिक भागीदार हैं। भारत श्रीलंका में स्थायी रूप से समस्या को हल करने के लिए मदद करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत में स्पष्ट जनादेश के साथ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के गठन के पश्चात श्रीलंका के नागरिकों की अपेक्षाएं विविध रूप से बढ़ी हैं। मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस के नेताओं को दिल्ली आमंत्रित करने की पहल, तमिल नेशनल अलायंस के नेताओं के साथ दिल्ली में बैठक और हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में श्रीलंका के राष्ट्रपति के साथ मोदी की मुलाकात श्रीलंकाई मुद्दों पर भारत सरकार की गंभीरता को दर्शाती हैं। श्रीलंकाई नौसेना द्वारा तमिल मछुआरों की श्रीलंकाई सीमा में प्रवेश करने पर हत्या और गिरफ्तारी का क्रम तमिलनाडु के नागरिकों में पिछले कई वर्षो से चिंता का विषय बना हुआ है। जब से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आई है तब से तमिलनाडु के मछुआरों की हत्या रुकी है और श्रीलंका की सरकार द्वारा तमिल मछुआरों की रिहाई की प्रक्रिया अति सक्रियता के साथ क्रियान्वित हुई है। हालांकि अभी भी कुछ मछुआरे श्रीलंका की हिरासत में हैं। श्रीलंकाई सरकार को जब्त किए गए जलपोतों को भी छोड़ना चाहिए। श्रीलंका में चीन की उपस्थिति और आधारभूत संरचना तथा रक्षा क्षेत्र में निवेश भारत के लिए चिंता का विषय है। यदि किसी को लगता है कि चीन भारत का विकल्प बन सकता है तो यह मात्र भ्रम है, क्योंकि हमारी और श्रीलंका की भौगोलिक परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं होने वाला है और दोनों राष्ट्रों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव समाप्त नहीं हो सकता।

श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था के लिए पर्यटन उद्योग अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीलंका ने पर्यटन क्षेत्र में वर्ष 2012 में लगभग 10 लाख से अधिक पर्यटकों को आकर्षित किया है और लगभग एक अरब डॉलर विदेशी मुद्रा अर्जित की है। यह श्रीलंका के हालात सामान्य होने के पश्चात नियमित आर्थिक वृद्धि को दर्शाता है। श्रीलंका विश्व का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थल बन सकता है, बशर्ते वहां स्थायी रूप से शांति बनी रहे। भारत और श्रीलंका को मिलाकर दोनों देशों में बौद्ध एवं हिंदू तीर्थ स्थलों को पर्यटक स्थलों के रूप में विकसित किया जा सकता है। श्रीलंका में कई स्थल रामायण से जुड़े हुए हैं। श्रीलंका का संप्रदाय हिंदुत्व विरोधी नहीं हैं। श्रीलंका के मठों एवं मंदिरों में भारत के ही समान देवी-देवता हैं। वर्तमान समय भारत में मोदी के नेतृत्व में एक त्वरित निर्णयकारी सरकार है। भारत एवं श्रीलंका के संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य संभव हैं। विवादित मुद्दों के सहज समाधान से भारत श्रीलंका में विकास कार्यो में अपनी सहभागिता बढ़ा सकेगा और आर्थिक निवेश के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार बन सकेगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं)

http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-peace-grows-from-sri-lanka-11728822.html?src=HP-EDI-ART