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“लक्ष्य 370, पर अभी दूर”

मोदी सरकार का एक साल पूरा होने को है। 30 साल बाद पूर्ण बहुमत से बनी किसी सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षाएं थीं। उम्मीदें अब भी हैं पर अब लोगों की आंखों में सवाल उससे कहीं ज्यादा हैं। एक साल में लोगों को जमीनी धरातल पर कुछ खास अंतर अब तक महसूस नहीं हुआ है। सुशासन, विकास और साफ-सफाई की बातें अब अधिक नहीं सुहातीं। नेता बदलने से मात्र जनता संतुष्ट नहीं है, उसे इंतजार है हालात बदलने का। पत्रिका संवाददातासमीर चौगांवकर के ऎसे ही कुछ चुभते सवालों के जवाब दिए हैं वरिष्ठ भाजपा नेता और कर्नाटक राज्य तथा भाजपा सदस्यों के प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रभारी मुरलीधर राव ने…

बेंगलूरू में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आडवाणी का संबोधन नहीं हुआ और ना ही भाजपा के स्थापना दिवस कार्यक्रम में आडवाणी आए। क्या माना जाए कि आडवाणी युग भाजपा में पूरी तरह से खत्म हो गया है?

भाजपा में समय समय पर हर व्यक्ति की भूमिका बदलती है और भूमिका बदलना सामयिक परिस्थितियों पर निर्भर होता है। जरूरी भी। यह हर पार्टी में होता है। पार्टी में व्यक्ति की सहभागिता, प्रतिबद्धता के आधार पर भूमिका तय होती है। पहले भी सरकार में रहते हुए अटल जी का समापन भाषण होता था। अब मोदी जी की सरकार है। देश की जनता ने उन्हें नेता चुना है। ऎसे में मोदी जी का समापन भाषण होने में कुछ भी गलत नहीं है। आडवाणी जी का पार्टी के कार्यकर्ताओं में, नेताओं में पूरा सम्मान है। आज पार्टी जहां पर है उसमें आडवाणी जी का बहुत अहम योगदान है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सरकार के लिए राम मंदिर मुद्दे को छोड़ा और अब जम्मू कश्मीर में सरकार के लिए धारा 370 से समझौता किया। क्या भाजपा में अब विचारधारा पर सत्ता हावी हो गई है?

मूल्यों के आधार पर राजनीति, पारदर्शिता, विकास और औद्योगिक विकास वहां पर हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है। जम्मू कश्मीर की जनता ने भी भाजपा को वोट सुशासन और विकास के लिए दिया है। यह डिलीवर करने के बाद ही लोगों में हमारी विचारधारा के प्रति विश्वास पैदा होगा। धारा 370 के प्रति हमारी धारणा नहीं बदली है। कुछ बातों के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। धारा 370 हमारा शॉर्ट टर्म गोल नहीं है। यह लॉन्ग टर्म गोल है। जम्मू कश्मीर देश का अभिन्न हिस्सा है। धारा 370 पर हम अडिग है। जहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलिदान दिया वहां हम 370 से समझौता करेंगे, इसका सवाल ही नहीं है।

संघ का स्वदेशी मॉडल और मोदी के विकास मॉडल में खींचतान क्यों है? दोनों में से देश के लिए श्रेष्ठ मॉडल कौन सा है?

कई बार बोलने में और करने में अंतर दिखता है और कहीं ना कहीं विरोधाभास है, ऎसा महसूस होता है। विपक्ष में रहने और सत्ता में आने के बाद प्राथमिकताओं की सूची में अंतर आता है और वह स्वाभाविक भी है। सरकार में आने के बाद संविधान के दायरे में, विश्व में छवि को ध्यान में रखकर काम करना पड़ता है लेकिन फिर भी मूल भावना में फर्क नहीं आता है। मोदी जी ने “मेक इन इंडिया ” को एक दिशा दी है।

मोदी सरकार स्वावलंबन का दायरा बढ़ाने की कोशिश में है। रक्षा के क्षेत्र में 4 -5 वर्षो में हम काफी हद तक देश मेें ही निर्माण कर सकेंगे। यह भी एक स्वदेशी का तरीका है। मोदी सरकार भारतीय उद्यमिता के साथ आगे बढ़ने के पक्ष में है। इस सरकार की मूल विकास की अवधारणा स्वावलबंन बढ़ाने और उद्यमिता को प्रोत्साहन देने की है। किसान बनाम औद्योगीकरण सरकार का दृष्टिकोण नहीं है। यह भ्रम विपक्ष द्वारा फैलाया जा रहा है।

भाजपा विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा कर रही है। फर्जी सदस्य बनाने का भी आरोप लग रहा है। जो सदस्य बने हैं क्या इन सदस्यों की भूमिका सिर्फ भाजपा को वोट देनें तक सीमित रहेंगी या पार्टी में भी जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे?

देश की आजादी के बाद जन्म लेने वाली पार्टी सिर्फ देश की नहीं विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनी है और यह भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ देश के लिए भी गर्व की बात है। यह सम्पूर्ण लोकतांत्रिक विश्व के लिए भी एक मिसाल है। इतनी प्रचंड सदस्यता होने में कुछ अपवादात्मक घटनाएं हो सकती हैं। सिर्फ कुछ अपवादों को पकड़कर पूरे सदस्यता अभियान पर सवाल खड़े करना न्यायसंगत नहीं होगा।

इस अभियान में बड़े पैमाने पर तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। एक मई से भाजपा का पूरे देश में महासम्पर्क अभियान शुरू होने वाला है। तीन महीने चलने वाले इस महासम्पर्क अभियान के तहत नए सदस्यों के साथ भाजपा के कार्यकर्ता व्यक्तिगत सम्पर्क करेंगे और असामाजिक तत्वों और जबरदस्ती बने सदस्यों को सदस्यता से अलग कर दिया जाएगा। कार्यकर्ताओं के अलावा पार्टी भी सदस्यों की सत्यता जांचेगी।

इसके बाद ही सदस्यों की अंतिम सूची जारी की जाएगी। इसके बाद बूथ स्तर के ऊपर की चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ होगी। पहले यह सदस्य प्रोविजनल मेम्बर्स होंगे। 15 लाख सक्रिय सदस्यों के लिए हम विशेष प्रशिक्षण देंगे। तीन महीने में पूरे देश में प्रशिक्षण आयोजित करने की तैयारी है। राष्ट्रीय विचारधारा, वैचारिक आंदोलन, पार्टी के इतिहास और विकास की भी संपूर्ण जानकारी देने के साथ अधिकतम सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

दिल्ली विधानसभा में भाजपा की करारी हार को मोदी सरकार के कामकाज की हार समझा जाए या संगठन की असफलता को दोष देंगे?

निश्चित तौर पर हमारी तैयारी कहीं ना कहीं कम रही और जनता को हम संदेश देने में विफल रहे जिसके कारण जनता ने विपक्ष पर भरोसा जताया। दिल्ली चुनाव स्थानीय चुनाव था, मोदी सरकार के कामकाज का आकलन नहीं था। मोदी मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले थे। पार्टी की रणनीति थी कि मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा जाए लेकिन जनता ने इसे दूसरे रूप में लिया। जनता जो चाहती थी वह हम डिलीवर करने में नाकाम रहे। पार्टी पहली बार नहीं हारी है। हार का विश्लेषण पार्टी करती है। दिल्ली में हम फिर वापसी करेंगे।

मोदी ने पार्टी के सम्पन्न लोगों से गैस सब्सिडी छोड़ने का आ±वान किया है। क्या पार्टी के सभी साधन सम्पन्न विधायक, सांसद गैस सब्सिडी छोड़ेंगे?

भाजपा गरीबों की पार्टी है। पार्टी के भीतर अरूण जेटली के श्रेणी के लोग जो टैक्स का भुगतान करते है वह गैस सब्सिडी छोड़ेंगे। भाजपा के सभी सांसद, विधायक और नेता साधन सम्पन्न नहीं हंै। ऎसी स्थिति में सबके लिए गैस सब्सिडी छोड़ना संभव नहीं है। इसके लिए पार्टी के क्या पैरामीटर्स होंगे अभी यह तय नहीं है। अभी यह स्वेच्छा पर है, जिसे लगता है वह छोड़ सकता है। सभी सांसद साधन सम्पन्न नहीं होते हैं। सांसदों को जो सुविधाएं मिलती हैं वह सामाजिक दायित्व के निर्वाह करने के लिए मिलती हैं।

26 मई को मोदी सरकार एक साल पूरा करने जा रही है। सरकार और संगठन के स्तर पर क्या तैयारी हो रही है?

राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इस पर विस्तार से चर्चा हुई थी। स्वतंत्रता के बाद पहली पूर्ण बहुमत से बनने वाली गैर कांग्रेसी सरकार भाजपा की है। लोकतंत्र मेें एक साल के बाद सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा जनता के सामने लेकर जाना चाहिए। यह सरकार और संगठन दोनों की जिम्मेदारी है। कार्यक्रमों की तैयारी सरकार और संगठन दोनों कर रहे हैं। संगठन निश्चित रूप से सरकार की उपलब्धियों को गांव-गांव तक पहुंचाने वाला है। इससे कोई कमी नहीं रखी जाएगी।

केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद से थोक में राज्यपालों को बदला गया और बर्खास्त किया गया। मध्य प्रदेश के राज्यपाल राम नरेश यादव के खिलाफ एसआईटी ने एफआईआर दर्ज करने के बाद भी केन्द्र सरकार राज्यपाल पर मेहरबान क्यों। क्या शिवराज को बचाने के लिए राज्यपाल को बचाया जा रहा है?

पार्टी में भ्रष्टाचार को आश्रय देना असंभव है। भ्रष्टाचार पर पार्टी जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाती आई है। सरकार परंपराओं का ध्यान रखती है। राज्यपाल भले ही परंपरा का पालन न करें। सरकार परंपरा का पालन करती है। राज्यपाल को क्यों बर्खास्त नहीं किया गया है या उन्हें पद पर क्यों बने रहने दिया जा रहा है इसका कारण तो गृह मंत्रालय ही बता सकता है।

भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर संघ असहज है। सरकार अडिग है। क्या इसे सरकार और संघ में मतभेद के रूप में देखा जाए।

भाजपा और संघ विचारधारा पर चलने वाले संगठन हैं। सरकार में न होते हुए भी दोनों मतभेदों के बाद भी साथ चले और सरकार में आने के बाद भी कुछ मुद्दों पर मतभेदों के बाद भी साथ चल सकते हैं। सरकार के सभी निर्णयों से जरूरी नहीं कि सभी संगठन शत-प्रतिशत सहमत हों, लेकिन सरकार और संगठन के बीच संवाद हमेशा रहा है। भारतीय किसान संघ और सरकार के बीच भी संवाद होता रहता है। किसान संगठनों के अच्छे सुझावों को सरकार शामिल कर सकती है। भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को लेकर सरकार के खिड़की दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। सरकार के लिए यह संवेदनशील विषय है और सरकार की पूरी कोशिश यही है कि किसानों का नुकसान न हो, खेती का नुकसान न हो।

भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि मोदी अगर फ्रांस से राफेल विमान का सौदा करते है तो यह गलत है और इसके खिलाफ वह कोर्ट भी जा सकते हैं। पार्टी के नेता ही मोदी के खिलाफ बोलें तो क्या संदेश जाएगा?

देखिए जो सुब्रमण्यम स्वामी के अतीत से वाकिफ हैं उन्हें उनके इस वक्तव्य से कुछ भी आश्चर्य नहीं होगा। प्रधानमंत्री के निर्णय पर उंगली उठाना गलत है। उन्हें कुछ कहना ही है तो उन्हें पार्टी के फोरम पर कहना चाहिए। पार्टी उनसे इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं करती। पार्टी अध्यक्ष उनसे इस सन्दर्भ में बात करेंगे।

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