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‘लंबा चलेगा तमिलनाडु का सियासी दंगल’

अन्नाद्रमुक नेता जे जयललिता के निधन के बाद से तमिलनाडु की राजनीति पर गहराए संकट के बादल छंटने का नाम नहीं ले रहे हैं। पन्नीर सेल्वम और शशिकला के बीच उत्तराधिकारी की जंग अभी खत्म भी नहीं हुई है कि भ्रष्टाचार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आ गया है।

प्रदेश का सियासी संकट बेशक अन्नाद्रमुक की अपनी आंतरिक वजह से है। मगर सूबे के वर्तमान राजनीतिक हालात के लिए भाजपा और उसकी केंद्र सरकार की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूबे की सियासी तस्वीर और भाजपा की भूमिका को समझने के लिए तमिलनाडु भाजपा प्रभारी एवं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव मुरलीधर राव से संजय मिश्र ने विशेष बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश:-

शशिकला मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से तमिलनाडु की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। प्रदेश की भावी राजनीति को भाजपा किस रूप में देख रही है?
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला तमिलनाडु की सियासत पर प्रभाव डालने के साथ देश की राजनीति के लिए भी एक सबक है। भ्रष्टाचार के मामले में किसी बड़े नेता पर दोष साबित होने के बाद उसे पहली बार सजा मिली है। इससे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को मदद मिलेगी। तो राजनेताओं में भी भय पैदा होगा।

प्रदेश के दोनों प्रमुख दलों अन्नाद्रमुक और द्रमुक का चेहरा जनता के सामने उजागर हुआ है। कोर्ट के फैसले के बाद तमिलनाडु की राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा। राज्य की राजनीति में अभी और अनिश्चितता बढ़ेगी। संकट से निजात पाने के लिए अन्नाद्रमुक के नेताओं को बेहतर समझदारी दिखानी पड़ेगी। प्रदेश की जनता ने जयललिता को विकास के लिए जनादेश दिया था। इसलिए अन्नाद्रमुक के नेताओं को इस समय परिपक्वता का प्रदर्शन करते हुए जनता का विश्वास बनाए रखना होगा।

केंद्र सरकार के जरिये भाजपा पर हस्तक्षेप का आरोप लगा है। सियासी चर्चा है कि भाजपा ने ही केंद्र के जरिये शशिकला की राह में रोड़ा अटकाया है?
यह आरोप सरासर गलत है। केंद्र सरकार ने परोक्ष या अपरोक्ष कहीं से भी तमिलनाडु की सियासत में हस्तक्षेप नहीं किया। शशिकला के खिलाफ फैसला सर्वोच्च न्यायलय ने दिया है। इसमें भाजपा या केंद्र सरकार का रोल कैसे संभव हो सकता है। रही बात सूबे के राजनीतिक हालात में भाजपा के हस्तक्षेप की तो पन्नीर सेलवम को न तो हमने मुख्यमंत्री बनाया और न ही हमने उन्हें पद से हटाया।

मुख्यमंत्री कौन हो नहीं हो, यह अन्नाद्रमुक का अपना मामला है। मुश्किल दौर से गुजर रहे प्रदेश के राजनीतिक हालात को सुदृढ़ करने के लिए अन्नाद्रमुक के नेतृत्व को परिपक्व फैसले लेने पडेंगे। वर्तमान राजनीतिक हालात से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है।

गर्वनर विद्यासागर की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं कि विधायकों का समर्थन हासिल होने के बावजूद भी उन्होंने शशिकला को शपथ नहीं दिलाई और न ही उन्हें मौका दिया?
राज्यपाल ने कहीं भी हस्तक्षेप नहीं किया है। न्यायालय के फैसले के बाद यह साबित हो गया है कि राज्यपाल का इंतजार सही था। वरना बड़ी फजीहत झेलनी पड़ती। उन्होंने संविधान का पालन किया है। उनकी भूमिका पर किसी तरह का सवाल उठाना गलत होगा। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने जता दिया है कि गवर्नर अपनी जगह सही हैं।

तमिलनाडु की वर्तमान राजनीति परिस्थितियों में भाजपा अपने आप को कहां देख रही है। पार्टी का भविष्य में क्या रोल रहेगा?
प्रदेश की राजनीति में भाजपा अभी कोई बड़ा रोल अदा करने की स्थिति में नहीं है। हां इतना जरूर कह सकता हुं कि तमिलनाडु की राजनीति में भाजपा के लिए अच्छे दिन आ सकते हैं।

राज्य में पीएम मोदी की लोकप्रियता काफी है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी का यूएसपी सूबे में भाजपा की जड़े गहरी करने में मदद करेगा। जबकि दूसरी ओर जयललिता की मौजूदगी के बगैर अन्नद्रमुक का राजनीतिक संकट और गहराएगा। जिस तरह के सियासी हालात हैं उसे देखकर लगता है कि अन्नाद्रमुक का दंगल लंबा चलेगा। तो द्रमुक के हालात भी अन्नाद्रमुक जैसे ही हैं।

 

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